दोस्तों, प्राचीन भारत के इतिहास से जुड़ी पिछली विडिओ में हमने उत्तर वैदिक काल के समाप्ति के समय भारत में बने 16 महाजनपदों के बारे में जाना। उन सभी महाजनपदों में जब वर्चस्व की लड़ाई चली तब मगध महाजनपद सभी महाजनपदों से शक्तिशाली सिद्ध हुआ। भगत की पराक्रमी राजा वंशों ने भारत के अधिकांश भूमि पर अपना वर्चस्व प्रस्थापित करते हुए मगध का साम्राज्य विस्तार किया। 

 

पाटलिपुत्र मगध साम्राज्य का इतिहास (Patliputra Magadh samraj ka itihaas)

तो आखिर तो ऐसे ही कौन से कारण थे की 16 महाजनपदों में केवल मगध ही अपना उत्कर्ष कर पाने में सफल रहा और वो ऐसे ही कौन से राजवंश थे जिन्होंने अपनी प्रचंड महत्वाकांक्षा के बल पर मगध को सबसे शक्तिशाली साम्राज्य बनाया? तो दोस्तों आज हम मगध के उत्कर्ष और उसके राजवंश ओके बारे में विस्तार से जानने की कोशिश करते हैं।

उत्तर वैदिक काल में लोहे की खोज के बाद विभिन्न जनपद आर्थिक दृष्टिकोण से संपन्न बनते जा रहे थे। संपूर्ण भारत में इस वक्त मानो विकास का दौर ही चल रहा था। ऐसे में मगध को इस बात का सबसे ज्यादा फायदा हुआ वो था छोटानागपुर का पठारी क्षेत्र।

भगत के हिस्से में आने वाले इस क्षेत्र से बड़ी मात्रा में लौह अयस्क प्राप्त हुए। लोहे की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध होने के कारण मगध हथियारों, युद्ध सामग्री और अवसरों में सबसे आगे रहा। नतीजन मगदलेने बड़ी मात्रा में जंगली लकड़ी को काटकर युद्ध में उपयुक्त होने वाले रथ बनाये। साथ ही साथ जंगलों से हाथियों को पकड़कर उन्हें युद्ध के लिए प्रशिक्षित किया, जिससे मगध की सेना अन्य महाजनपदों से काफी शक्तिशाली बनी।

भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो मगध प्राकृतिक रूप से काफी सुरक्षित स्थान पर बसा हुआ था। उसकी प्रारंभिक राजधानी राजगृह पहाड़ियों से घिरी हुई थी तो दूसरी राजधानी पाटलिपुत्र, गंगा, गंडक और सोन नदी के संगम पर बसी हुई थी। जिसकारण मगध पर आक्रमण करके उसे जीत पाना आसान नहीं था। राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो मगध में क्रमिक रूप से जो भी राजवंश आए उन सभी राज्य वंशों में 

मगध साम्राज्य के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान

अनिका ने एक शक्तिशाली राजा हुए जिन्होंने मगध के साम्राज्य विस्तार में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया और मगध की प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाया, जिससे बढ़ती साम्राज्य पर नियंत्रण रख पाना मगध के लिए आसान साबित हुआ। इसी के साथ साथ मगध में भी चैन नदियों के जाल और वहाँ के जलोढ़ मिट्टी से कृषि से अधिशेष उत्पाद का निर्माण हुआ, जिसका व्यापार नदी मार्गों के माध्यम से भारत के अन्य क्षेत्रों में किया गया। 

इसे मगध आर्थिक रूप से बेहद ही संपन्न राज्य बना। इस प्रकार मगध की हो रही आर्थिक वृद्धि, उसकी प्रशासनिक स्थिरता और राज्य वंशों की महत्वाकांक्षा ने मगध को अन्य महाजनपदों से काफी आगे बढ़ाया। 

मगध की उत्कर्ष में क्रमश हर्यक वंश, शिशुनाग वंश, नंदवंश और मौर्यवंश इन राज्य वंशों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार को भगत के संस्थापक के रूप में देखा जाता है, लेकिन मगध साम्राज्य की सत्ता का वास्तविक संस्थापक राजा को माना जाता है। केवल अपनी 15 वर्ष की आयु में मगध साम्राज्य की बागडोर संभालने वाले बिम्बिसार हर्यक वंश के प्रथम शक्तिशाली शासक थे। 

जैन साहित्य में उन्हें श्रेणी के नाम से वर्णित किया गया है। राजा बिंबिसार ने मगध के विस्तार की नींव वैवाहिक संबंधों के माध्यम से रखी। उन्होंने तीन विवाह किए, जिसमें पहला विवाह उन्होंने कौशल राज़ की पुत्री तथा प्रसंजित की बहन महाकौशला देवी से इस वैवाहिक संबंध में उन्हें दहेज में एक काशी प्रांत मिला। उनका दूसरा विवाह लिच्छवि की राजकुमारी चेल्लना के साथ हुआ। रानी चेलना से  

 

आजाद शत्रु

उन्हें अजातशत्रु नाम का पुत्र हुआ और उनका तीसरा विवाह पंजाब के मध्य कुल की राजकुमारी से हुआ। इन वैवाहिक संबंधों से राजा को बड़ी राजनीतिक प्रतिष्ठा मिली और मगध को पश्चिम एवं उत्तर की तरफ विस्तार करने का मार्ग प्रशस्त हुआ। राजा बिंबिसार ने अंग राज्य को जीत कर उसे मगध में मिला लिया और अपने पुत्र अजातशत्रु को। 

वैवाहिक संबंधों से राजा बिम्बिसार को बड़ी राजनीतिक प्रतिष्ठा मिली और मगध को पश्चिम एवं उत्तर की तरफ विस्तार करने का मार्ग प्रशस्त हुआ। राजा ने अंग राज्य को जीतकर से मगध में मिला लिया और अपने पुत्र अजातशत्रु को वहाँ का शासक नियुक्त किया। अवंती के शासक

चंद्रप्रद्योत से राजा बिम्बिसार के मित्रता पूर्व संबंध थे। जब राजा चंद्रप्रद्योत बीमार पड़े तब अपने राजवेध

जीवक को राजा बिंबिसार ने इलाज के लिए अवंती भेजा था। राजा बिम्बिसार के लगभग 52 वर्षों तक शासन

करने के बाद उनके पुत्र अजातशत्रु ने 400 बयान्चे ईसा पूर्व में

उनकी हत्या कर मगध की राजगद्दी पर अपना अधिकार स्थापित किया। अजातशत्रु जैन मतानुयायी था. उसका उपनाम यूनीक था। राजा बिम्बिसार की हत्या करने के कारण अजातशत्रु को कौशल नरेश राजा प्रसेनजीत के साथ युद्ध करना पड़ा। इस युद्ध में जीत की पराजय हुई और समझौते में राजा को अपनी पुत्री वाजिरा का विवाह अजातशत्रु से ही करवाना पड़ा। आजाद शत्रु का

छवियों के साथ भी युद्ध हुआ। अपने ही कूटनीतिक मित्र वस्त्रकार की सहायता से उस ने लिच्छवियों पर विजय

प्राप्त की। इस युद्ध में उसने रथ मुसल और महाशिला कटक नामक हथियारों का प्रयोग किया था। इस प्रकार

अजातशत्रु ने काशी और वैशाली दोनों को मगध का अंग बनाया। अजातशत्रु के समय में ही राजगृह की

सप्तपर्ण गुफा में प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ था। 32 वर्षों तक शासन करने के बाद

अजातशत्रु को भी उसके पुत्र उदयन द्वारा मार डाला गया। पिता की हत्या करके पुत्र द्वारा बार बार गद्दी हथियाने की वजह से हर एक वंश को पितृ हन्ता वंश के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक तथा जैन ग्रन्थों के अनुसार उदयन ने गंगा, सोन और गंडक नदी के संगम तट पर पाटलिपुत्र नामक नगर की स्थापना की और उसे अपनी राजधानी बनाया। उदय जैन मतानुयायी था। उसका पुत्र नागदशक।

हर एक वंश का अंतिम शासक था। नागदशक के अमात्य शिशुनाग ने नागदशक को पदच्युत करके राजगद्दी पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया और फिर शिशुनाग नामक एक नए वंश की स्थापना हो गयी।

शिशुनाग ने अवंती तथा बात से राज्य पर अधिकार करके उसे मगध साम्राज्य का हिस्सा बनाया और अपनी राजधानी को वैशाली में स्थापित किया। शिशुनाग के शासनकाल में मगध बंगाल से मालवा तक फैल चुका था।

कालाशोक ने वैशाली की जगह पाटलिपुत्र को पुनः अपनी राजधानी के रूप में स्थापित किया कालाशोक के समय ही वैशाली में द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया था। पुराण तथा दिव्यादान में कालाशोक को काकवर्ण नाम से संबोधित किया गया है। बाणभट्ट रचित हर्षचरित के अनुसार काक बन की राजधानी पाटलिपुत्र में घूमते समय महापद्मनन्द नामक व्यक्ति ने चाकू मारकर हत्या कर दी। कालाशोक की मृत्यु के पश्चात

उसके पुत्रों ने 22 वर्षों तक मगध पर शासन किया। नदीवर्धन शिशुनाग वंश का अंतिम शासक रहा और फिर मगध पर नन्द वंश की स्थापना हुई। महापदानन्द पुराणों के अनुसार मगध पर नन्द वंश की स्थापना करने वाला महापद्मनन्द एक शुद्ध तथा पुराणो में उसे सर्व क्षत्रान्तक अर्थात क्षत्रीयों का नाश करने वाला तथा भार्गव अर्थात परशुराम का दूसरा अवतार कहा गया है।‌

अपने निकटवर्ती सभी राज्यों को जीतकर मदद के विशाल साम्राज्य का निर्माण कर चूके महापद्मनन्द ने अपने आप को एक रात एवं एक छात्र की उपाधि धारण की। उसने कालिंग को जीता और वहाँ से जिनसे इनकी मूर्ति को उठाकर मगध दिलाया। महापद्मनन्द के आठ पुत्रों में से धनानन्द नन्द वंश का अंतिम शासक रहा। सन् 326 ईसा पूर्व में सिकंदर ने जब पश्चिमोत्तर भारत पर आक्रमण किया।

 

धनानंद

मगध पर धन आनंद का शासन था अर्थात धन आनंद सिकंदर का समकालीन था। यूनानी लेखेकों ने धनानन्द 

को अग्रमच कहकर पुकारा है। धन आनंद ने जनता पर कई सारे कर लाते थे, जिसके कारण जनता धन आनंद से असंतुष्ट थी तक शीला के आचार्य चाणक्य को भरे दरबार में अपमानित करने के बाद सन् 322 ईसा पूर्व में आचार्य चाणक्य ने अपने शिष्य चन्द्रगुप्त मौर्य की सहायता से

धन आनंद की हत्या कर मौर्य वंश की नींव रखी और फिर मगध पर मौर्य वंश की स्थापना हुई। मौयों के शासन काल में मगध साम्राज्य चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया। मगध साम्राज्य के उत्कर्ष में मौर्य राजाओं का योगदान अनन्य असाधारण है। यू